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| अनुलोम विलोम प्राणायाम के फायदे |
अनुलोम विलोम प्राणायाम क्या है
अनुलोम का मतलब सीधा और विलोम माने उल्टा। यहां पर सीधे से तात्पर्य है नासिका या नाक का दाहिना छिद्र और उल्टा का अर्थ है-नाक का बायां छिद्र। अर्थात् अनुलोम-विलोम प्राणायाम में क्रमश: नाक के दाएं छिद्र से सांस लेते हैं, तो बायीं नाक के छिद्र से सांस बाहर छोड़ते है। इसी क्रम में नाक के बाएं छिद्र से सांस खींचना, और नाक के दाहिने छिद्र से सांस को बाहर छोड़ना होता है। अनुलोम-विलोम प्राणायाम को 'नाड़ी शोधक प्राणायाम' भी कहते हैं। इसके नियमित अभ्यास से शरीर की समस्त नाड़ियों का शोधन होता है यानी वे स्वच्छ व निरोगी बनती है। इस प्राणायाम के अभ्यास करने वाले को वृद्धावस्था में भी गठिया, जोड़ों का दर्द व सूजन आदि स्वास्थ्य समस्यायें नहीं होतीं।अनुलोम विलोम के लाभ(benefits of anulom vilom pranayam)
अनुलोम विलोम प्राणायाम को जीवनदायिनी शक्ति कहा जाए तो कोई आश्चर्य नहीं है। यदि अनुलोम विलोम नियमित और सही तरीके से किया जाये तो इसके इतने फायदे मिलते है की आप सोंच भी नहीं सकते। रोग क्या होते है, ये आप भूल ही जायेंगे। अनुलोम-विलोम/नाड़ी शोधन प्राणायाम के कुछ संभावित लाभ हैं:रक्तचाप के लिए अनुलोम विलोम के लाभ (anulom vilom for blood pressure)
अनुलोम विलोम प्राणायाम उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) और धमनियों के सिकुड़ने से होने वाली हार्ट संबंधी समस्याओं से ग्रसित लोगों में ब्लड प्रेशर को काफ़ी कम करने में मदद करता है। यह एड्रेनालिन (तनावपूर्ण, उत्तेजक या खतरनाक परिस्थितियों में शरीर में स्रावित होने वाला एक हार्मोन) से संबंधित तंत्रिका गतिविधि और परिधीय रक्त वाहिकाओं के हार्डनेस को कम करता है। इस प्रकार, यह स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (तंत्रिकाओं का एक जाल जो रक्तचाप और हृदय गति सहित अन्य अनैच्छिक शारीरिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है) को पुनः समायोजित करने में सहायता करता है ।ऐसा माना जाता है कि बाएं नथुने से सांस लेने से प्रकुंचन दाब ( दिल की एक धड़कन के दौरान धमनियों में रक्तचाप), शिथिलन दाब (दिल की दो धड़कनों के बीच दिल के आराम करने पर धमनियों में रक्तचाप) और औसत रक्तचाप कम करने में मदद कर सकता है, जिससे उच्च रक्तचाप के लक्षण नियंत्रित हो सकता है। दाएं नथुने से सांस लेने से हृदय गति सामान्य हो सकती है और रक्तचाप सामान्य स्तर पर आ सकता है। यह ऐसे लोगों में सुबह के साथ-साथ शाम को ब्लड प्रेशर में वृद्धि को कम करने के लिए फायदेमंद हो सकता है जिनका सिस्टोलिक दबाव 120-139 mm/hgऔर डायस्टोलिक दबाव 80-89 mm/hg(प्री-हाइपरटेंसिव) के बीच रहता है ।
मस्तिष्क के लिए अनुलोम विलोम के लाभ (benefit of anulom vilom for brain health)
अनुलोम-विलोम प्राणायाम की क्रिया में, श्वास प्रक्रिया फेफड़ों के दोनों ओर, पेल्विक गर्डल में डायाफ्राम के आधार से शुरू होती है। सीने में स्थित डायाफ्राम की मांसपेशियाँ और गर्दन में श्वसन की पूरक मांसपेशी शिथिल हो जाती हैं, जिससे चेहरे की मांसपेशियों भी रिलेक्स होती है। चेहरे की मांसपेशियों का यह रिलेक्स उन्हें मस्तिष्क पर बिना किसी अतिरिक्त दबाव के, ज्ञानेंद्रियों, जैसे कान, आँख, जीभ, नाक और त्वचा तक समान प्रभाव पहुँचाने में सक्षम बनाता है। तनाव का यह कम स्तर एकाग्रता के स्तर को बढ़ाने और मन की स्थिरता को बढ़ाने में मदद करता है।जिससे यह स्मरण शक्ति में सुधार कर सकता है।अनुलोम-विलोम के दौरान की गई साँस छोड़ने की क्रिया मस्तिष्क की तंत्रिकाओं पर भी आरामदायक प्रभाव डालती है। जब प्राणायाम के साथ कुंभक किया जाता है, तो मन में शांति उत्पन्न होती है। अनुलोम-विलोम के दोरान ली जाने वाली नियंत्रित श्वास मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं में रक्त प्रवाह को बढ़ाने में मदद करती है।
अनुलोम-विलोम के दौरान साँस लेना और छोड़ना अग्र मस्तिष्क और पश्च मस्तिष्क दोनों भागों को तरोताज़ा करने में मदद करता है। साँस लेने का यह वैकल्पिक पैटर्न मस्तिष्क के विभिन्न भागों में होने वाली सभी गतिविधियों को संतुलित करता है, जिससे सामंजस्य और शांति की भावना पैदा होती है ।
हृदय के लिए अनुलोम विलोम के लाभ (benefits for heart of anulom vilom)
अनुलोम विलोम में स्थिर और नियंत्रित श्वास लेने से श्वास दर के साथ-साथ हृदय गति भी नियंत्रित होती है। ऐसा माना जाता है कि अनुलोम विलोम का अभ्यास हृदय को पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका तंत्र के नियंत्रण में लाने में सहायक होता है, जो जटिल न्यूरॉन्स का एक नेटवर्क है जो खतरनाक या तनावपूर्ण स्थितियों के बाद शरीर को आराम देने के लिए होता है ।श्वसन तंत्र के लिए अनुलोम विलोम के लाभ
अनुलोम विलोम में नाक के रास्ते हवा अंदर लेने से नाक और श्वसन मार्ग से लेकर फेफड़ों तक की सफ़ाई होती है।.इससे खांसी से राहत मिल सकती है। इससे फेफड़ों की ताकत बढ़ती है जिससे उन्हें किसी भी बीमारी से मुक्त रखने में मदद मिल सकती है।अनुलोम विलोम प्राणायाम के कुछ अन्य फायदे
1.सर्दी, जुकाम व दमा की समस्या से काफी हद तक राहत देता है और बचाव करता है।2.गठिया के कारण होने वाले जोड़ों के दर्द के लिए फायदेमंद है।
3.मांसपेशियों को रिलेक्स कर उनकी कार्य प्रणाली में सुधार करता है।
4. हमारा पाचन तंत्र को दुरुस्त होता है।जिससे पाचन संबंधी दिक्कतों जैसे गैस, अपच, आदि से राहत मिल जाती है।
5. यह प्राणायाम ध्यान केंद्रित करता है जिससे तनाव और चिंता को कम होती है।
6.पूरे शरीर में अधिक मात्रा में और निरंतर शुद्ध ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाता है।
7.हमारे शरीर की सुक्ष्मादी सुक्ष्म नाडी शुद्ध हो जाती है।
8.आर्थराईटीस, रूमेटिड आर्थराईटीस, कार्टीलेज घिसना जेसी दिक्कतों को ठीक करता है।
9.टेढे लीगामेंटस सीधे हो जाते है जिससे घुटनों को मजबूती मिलती ह
10.व्हेरीकोज व्हेनस जिसमे नसें सूज जाती हैं और नीली पड़ जाती है रक्त प्रवाह नीचे की तरफ बढ़ जाता हैं,ठीक हो जाती है।
11. कोलेस्ट्रॉल,टॉक्सिंस , ऑक्साइडेंट्स् जैसे विजतीय पदार्थ शरीर के बहार निकल जाते हैं।
12. किडनी प्राकृतिक रूप से स्वच्छ होती है, डायलेसीस करने की आवश्यकता नहीं पडती|
13.सभी प्रकार की एलर्जी जैसे सांस की एलर्जी, पेट की एलर्जी, चमड़ी की एलर्जी ठीक हो जाती है।
14.पर्किनसन, फ्लोरोसिस, तोतलापन इत्यादी स्नायुओं से संबंधित व्याधिओ को ठीक करने के लिये भी फायदेमंद है।
15. यह प्राणायाम सांसों को ग्रहण करने की एक वैज्ञानिक विधि है यह श्वशन मार्ग की व्याधियों जैसे सायनस को भी ठीक करने की क्षमता रखती है।
16. ठंडीऔर गरम हवा के उपयोग से हमारे शरीर का तापमान संतुलित रहता है।
17. चूंकि प्राणायाम के दोरान शुद्ध और पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है जिससे हमारा कोशिकीय तंत्र मजबूत होता है इससे हमारी प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।
अनुलोम विलोम के दोरान सावधानियां
यध्यपि यह प्राणायाम संपूर्ण स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है किंतु इसकी कुछ सीमाएं है, प्राणायाम के समय रखी जाने वाली सवधानियां इस प्रकार से है-1- कमजोर और एनीमिया से पीड़ित रोगी इस प्राणायाम के दौरान सांस भरने ( पूरक) और सांस निकालने (रेचक) की गिनती को क्रमश: 4-4 ही रखें। अर्थात् चार गिनती तक सांस का भरना तो चार गिनती तक ही सांस को बाहर निकालना है।
स्वस्थ व्यक्ति धीरे-धीरे यथाशक्ति पूरक-रेचक की संख्या और अवधि बढ़ा सकते हैं।
2- कुछ लोग समया की कमी के कारण सांस भरने और सांस निकालने का अनुपात 1:2 नहीं रखते। वे बहुत तेजी से और जल्दी-जल्दी सांस लेतेऔर छोड़ते है। इससे वातावरण में व्याप्त धूल, धुआं, जीवाणु और वायरस, सांस नली में पहुंचकर अनेक प्रकार के संक्रमण उत्पन्न कर सकते हैं।
3- अनुलोम-विलोम प्राणायाम करते समय सांस की गति इतनी सहज होनी चाहिए कि इस प्राणायाम को करते समय स्वयं को भी आवाज न सुनायी पड़े। अर्थात सांस इतनी धीमी हो की यदि नासिका के सामने आटे जैसी महीन वस्तु रख दी जाए, तो पूरक व रेचक करते समय वह न अंदर जाए और न अपने स्थान से उड़े।

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